रांची: भाषिक और वैचारिक धरातल पर, संत रैदास, संत कबीर और पारंपरिक 'रामराज' की अवधारणाएँ भारतीय आदर्श समाज (यूटोपिया) के तीन अलग-अलग, और अक्सर विरोधी मॉडलों को प्रस्तुत करती हैं। जब हम इन अवधारणाओं को श्रमण परंपरा—जिसका पूर्ण विकास बुद्ध दर्शन में हुआ—की कसौटी पर परखते हैं, तो इनके आंतरिक संघर्ष साफ दिखाई देते हैं। बुद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत—उत्पादक श्रम, पूर्ण समता, मानवीय कर्तृत्व (अपने भाग्य का स्वयं निर्माता होना), और पारलौकिक काल्पनिक स्वर्ग के बजाय 'इसी लोक' (यही-लोक) में दुख-मुक्ति और सुख की स्थापना—इन मॉडलों को परखने का मुख्य आधार हैं।
भाषावैज्ञानिक डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के दृष्टिकोण के अनुसार, इन आदर्श समाजों की भाषा केवल वर्णन नहीं करती, बल्कि वह उस सामाजिक वर्ग के वैचारिक नज़रिेेया का निर्माण करती है जिसने उसे रचा। वे कहते हैं, "संत साहित्य की भाषा ब्राह्मणवादी वर्चस्व के विरुद्ध दबे-कुचले वर्गों का भाषिक विद्रोह है, जहाँ शब्द स्वयं में हथियार हैं।"
रैदास का 'बेगमपूरा': ज़मीनी समतामूलक समाज
वैचारिक विश्लेषण: रैदास (स्वयं मेहनतकश, चर्मकार) ने 'बेगमपूरा' (बिना गम या दुख का शहर) की एक भौतिक और राजनीतिक परिकल्पना प्रस्तुत की। श्रमण या बौद्ध दर्शन के अनुसार, यह सबसे ठोस और इसी लोक पर आधारित मॉडल है। यह बुद्ध के उस विचार के करीब है जहाँ दुख का अंत केवल मानसिक नहीं, बल्कि भौतिक अभावों की मुक्ति से भी जुड़ा है। यहाँ 'समता' केवल आत्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक है।
श्रम की प्रतिष्ठा: 'बेगमपूरा' श्रमजीवी वर्ग का आदर्श है, जहाँ उत्पादक श्रम को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त है। बुद्ध ने भी 'सम्यक आजीविका' (Ethical Livelihood) पर बल दिया था, जिसमें दूसरों के श्रम पर जीना वर्जित है। रैदास को अपने श्रम पर गर्व है ("ऐसी मेरी जाति विख्यात चमार"), और वे एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहाँ परजीवी वर्ग (बिना श्रम किए खाने वाले) के लिए कोई स्थान नहीं है।
सामाजिक समता: यहाँ वर्ण-जाति का भेद, आर्थिक शोषण, और राजकीय रोक-टोक की पूर्ण अनुपस्थिति है ("आवाजाही न होइ अटक।।")। यह बुद्ध के जाति-विहीन और ऊंच-नीच से मुक्त संघ (समाज) के मॉडल का भाषिक विस्तार है।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का दृष्टिकोण:
"'बेगमपूरा' की शब्दावली (सहर, दुख-अंदोह, कर, मालकी) अत्यंत भौतिक और ज़मीनी है। यह एक ऐसे वर्ग की भाषा है जिसने गरीबी और सामाजिक अपमान को भोगा है। रैदास उत्पादक श्रम को 'पवित्र' और ब्राह्मणवादी परजीविता को 'शोषण' के रूप में भाषिक रूप से पुनर्परिभाषित करते हैं, जो बौद्ध आर्थिक दर्शन के करीब है।"
कबीर का 'अमरदेशवा': मानसिक समता और जाग्रत चेतना का लोक
वैचारिक विश्लेषण: कबीर ने भी 'बेगम देस' की बात की, लेकिन उसे 'अमरदेशवा' (अमर देश) के रूप में एक अलग ऊंचाई दी। बुद्ध दर्शन के अनुसार, कबीर का मॉडल रैदास की तुलना में अधिक मनोवैज्ञानिक और आंतरिक है। यह बुद्ध के इस विचार के अत्यंत निकट है कि सभी दुखों का मूल कारण मन के विकार (तृष्णा, अविद्या) हैं, और असली समता मन के रूपांतरण से आती है।
जाग्रत चेतना का राज्य: 'अमरदेशवा' एक ऐसी अवस्था (State of Mind) है जहाँ मन भय, भ्रम, माया और द्वैत (हिंदू-मुसलमान, ऊंच-नीच का भेद) से मुक्त हो जाता है। यह बुद्ध के 'निर्वाण' (मानसिक शांति और तृष्णा का अंत) की अवस्था का भाषिक रूप है। यहाँ कबीर बाहरी भेदभाव को आंतरिक जाग्रत चेतना (विशुद्ध ज्ञान) से काटते हैं ("अवधू बेगम देस हमारा।।")।
मानवीय कर्तृत्व: कबीर आदर्श समाज के लिए किसी बाहरी ईश्वर या राजा पर निर्भर नहीं हैं; वे स्वयं के प्रयासों से मन को जीतने की बात करते हैं, जो बुद्ध के सिद्धांत 'अप्प दीपो भव' (अपना दीपक स्वयं बनो) के अनुरूप है।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का भाषिक दृष्टिकोण:
"कबीर की भाषा भौतिक नगर से हटकर आंतरिक मनोविज्ञान की ओर मुड़ती है। शब्दावली (अवधू, देस, माया, अखंड) मनुष्य की चेतना के आंतरिक द्वंद्व को व्यक्त करती है। यह भाषा बाहरी जाति भेद को नकारते हुए 'सब में एक ही चेतना' की भाषिक एकता स्थापित करती है, जो बौद्ध दर्शन के अद्वैत (भेदभाव-रहित) पक्ष को मज़बूत करती है।"
रामराज: वर्णाश्रम धर्म की पुनर्स्थापना का पारंपरिक मॉडल
वैचारिक विश्लेषण: पारंपरिक रूप से, 'रामराज' को एक ऐसे आदर्श राज्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है जहाँ सब सुखी हैं ("दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।")। लेकिन जब हम इसके आंतरिक ढांचे को देखते हैं, तो यह श्रमण या बौद्ध दर्शन के वैचारिक रूप से विपरीत ध्रुव पर खड़ा है।
वर्णाश्रम धर्म का आधार: तुलसीदास के 'रामराज' की सफलता का मूल आधार वर्णाश्रम धर्म (जाति पदानुक्रम) का कड़ाई से पालन है। यहाँ सुख का अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जन्म-निर्धारित वर्ण और आश्रम की मर्यादा में रहे। यह बुद्ध के मूल सिद्धांत का खंडन है, क्योंकि बुद्ध ने व्यक्ति की योग्यता को उसके कर्म से तय किया था, जन्म से नहीं। 'रामराज' का मॉडल उस विचार को भाषिक मान्यता देता है जहाँ गुणी शूद्र की तुलना में गुणहीन ब्राह्मण पूज्य है ("पूजहि विप्र सकल गुणहीना, सूद्र न पूजहि ज्ञान प्रवीना"), जो बुद्ध दर्शन की 'समता' पर सीधा हमला है।
श्रम का अवमूल्यन: यहाँ उत्पादक श्रम करने वाले वर्गों को केवल सेवा भाव में लगे रहने का उपदेश है, जबकि परजीवी वर्गों को धार्मिक मान्यता प्राप्त है। कर्तृत्व (Self-Agency) के बजाय यहाँ सुख का स्रोत ईश्वर या राजा राम की कृपा और शास्त्रों का पालन है, जो बौद्ध दर्शन के कर्मवाद (व्यक्ति अपने कार्यों का फल भोगता है) के विरुद्ध है।
दृष्टिकोण- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
"'रामराज' की शब्दावली (वर्णाश्रम धर्म, मर्यादा, वेद-पुराण) प्राचीन, सत्तावादी, और पदानुक्रम को मज़बूत करने वाली है। यह एक ऐसे वर्ग की भाषा है जो सामाजिक असमानता को 'प्राकृतिक' और 'धार्मिक रूप से सही' मानती है। यहाँ सुख और शांति को 'मर्यादा' के पालन से जोड़ा गया है, जो बुद्ध दर्शन के प्रगतिशील और परिवर्तनवादी कर्म के सिद्धांत को भाषिक रूप से नकारता है।"
निष्कर्ष: बौद्ध या श्रमण परंपरा की कसौटी पर, 'बेगमपूरा' और 'अमरदेशवा' दोनों एक ही क्रांतिकारी मूल्य-धारा की दो अलग-अलग (एक भौतिक, एक मानसिक) अभिव्यक्तियाँ हैं, जो जन्म-आधारित श्रेष्ठता को पूरी तरह खारिज करती हैं। यह बुद्ध के इस विचार की पुष्टि है कि असली 'यूटोपिया' तभी संभव है जब मनुष्य बाहरी रूप से सामाजिक-आर्थिक रूप से समान हो और आंतरिक रूप से विकारों से मुक्त हो। इसके विपरीत, पारंपरिक 'रामराज' बौद्ध दर्शन के लिए एक प्रतिक्रांति (Counter-Revolution) है, जो सामाजिक असमानता और अधीनता को 'धार्मिक पवित्रता' प्रदान करने का तंत्र है। युवाओं को इन वैचारिक अंतरों को गहराई से समझना होगा ताकि वे प्रतीकों के खेल में भ्रमित न हों और बुद्ध द्वारा दिखाए गए वास्तविक समतामूलक और तार्किक मार्ग की पहचान कर सकें।
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