रांची : झारखंड की माटी पर धूप तीखी है, लेकिन उससे भी ज़्यादा तीखा वह सन्नाटा है जो इस राज्य के अनुसूचित जाति (SC) युवाओं की बस्तियों में पसरा है। यह सन्नाटा मजबूरी का नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित और सधे हुए 'बहिष्कार' का है। एक युवा, अपनी डिग्री की फाइल को छाती से चिपकाए राजधानी की सड़कों तक घूम रहा है। वह सरकारी दफ़्तर की चौखट पर जाता है, तो नियम-कानूनों की ऐसी बारीक दीवारें उसके सामने खड़ी कर दी जाती हैं कि वह बिना लड़े ही बाहर हो जाता है। नीतियां ऐसी बुनी जा रही हैं जैसे कोई कुशल दर्जी किसी खास वर्ग के नाप का कपड़ा ही न सीए। नौकरी की उम्मीद हो, व्यवसाय का सहारा हो, या स्वाभिमान का कोई ज़रिया—वर्तमान सरकार में इस वर्ग के युवाओं को हर चीज़ से बहुत ही अदृश्य और सलीके से 'बेदखल' किया जा रहा है।

​यह केवल बेदखली नहीं है; यह एक पूरी पीढ़ी की दूरदर्शिता की हत्या का सुनियोजित प्रयास है। जब राजा ही अपनी प्रजा के एक हिस्से को अपनी निगाहों से ओझल कर दे, तो शिकायत किससे की जाए? आज की सत्ता आपको लाठी से नहीं मारती; वह आपके हाथ से वह संसाधन छीन लेती है जिससे आप अपनी तकदीर लिख सकते थे। वह जानती है कि अगर इस वर्ग का युवा आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गया, तो वह फिर वह अपने हिस्से के संसाधन के लिए जागरूक होगा। इसलिए, उसे रोज़मर्रा की छोटी-छोटी चुनौतियों में ऐसा उलझाकर रखा जाता है कि उसकी सोच रोटी, कपड़ा और एक अदद सर्टिफिकेट के सत्यापन से आगे बढ़ ही न पाए।

अपनी माटी पर अपना कोड लिखना होगा तभी बेदखली का होगा अंत

​लेकिन इस गहरी बेदखली के बीच, जो 'रूढ़िवादी घेराबंदी' के नियंत्रण से बाहर है—वह है आपके हाथ में मौजूद यह पाँच इंच का डिजिटल यंत्र। जिसकी रौशनी का रंग भी नीला है। सरकारें आपकी ज़मीन छीन सकती हैं, वे आपकी फाइलों को दफ़्तरों में दबा सकती हैं, लेकिन वे उस 'नेटवर्क' को नहीं रोक सकतीं जो हवा में तैर रहा है।

अब सवाल यह नहीं है कि सरकार हमारे साथ क्या कर रही है। सवाल यह है कि इस सुनियोजित बेदखली के बाद भी हम बिखरे क्यों हैं? जब हमारा दर्द एक है, जब हमारा खलनायक एक है, और जब हमारी बस्तियों की मार्मिक स्थिति एक जैसी है, तो हमारी 'ताकत' अलग-अलग क्यों बंटी हुई है? अगर हम आज भी अकेले-अकेले गिड़गिड़ाते रहेंगे, तो यकीन मानिए, हमें ऐसे ही रोज धक्के मारकर बेदखल किया जाता रहेगा। भेड़ों की तरह बिखरा हुआ समाज सिर्फ और सिर्फ 'शिकार' बनता है, हकदार नहीं।

​क्या इस बेदखली का जवाब 'डिजिटल संगठन' से नहीं दिया जाना चाहिए?

​वक्त आ गया है जब इस वर्ग के युवाओं को अपनी प्रज्ञा, अपने तकनीकी कौशल और अपने सुलगते विचारों को एक जगह लाकर एक ऐसा अभेद्य डिजिटल को-ऑपरेटिव खड़ा करना होगा—एक ऐसा समानांतर (Parallel) तंत्र, जिसे सेंसर करने या तोड़ने की तासीर किसी भी सरकारी नीति या किसी बैंक मैनेजर के अहंकार में न हो।

​क्या हमारे भीतर एक ऐसी चेतना की लहर नहीं सुलगनी चाहिए जो इस बिखरे हुए युवाओं को एक सूत्र में पिरोने का 'कोड' खुद तैयार करे? एक ऐसा विचार मंच क्यों नहीं होना चाहिए जो इस मार्मिक चीख को एक संगठित गूँज में बदल दे... जहाँ पहुँचकर यह बेदखल युवा अब दूसरों के आगे हाथ फैलाने के बजाय, खुद अपनी तकदीर का सॉफ्टवेयर लिखे!