रांची : राजधानी के प्रशासनिक गलियारों में नीतिगत विमर्श की चमक तीव्र है। विधायी प्रक्रियाओं के तहत एक के बाद दूसरा बजट सत्र आहूत होकर इतिहास के पन्नों में दर्ज़ हो चुका है, और सत्ता अब तीसरे सत्र के आयोजन की तैयारियों में मग्न है। आंकड़ों और आवंटनों का एक ऐसा तकनीकी मायाजाल बुना जा रहा है, जो प्रथम दृष्टया लोक-कल्याण का भ्रम पैदा करता है। किंतु इस चमक-दमक के ठीक पीछे, एक बहुत ही शांत और सुनियोजित 'संवैधानिक बेदखली' का दस्तावेज़ तैयार हो रहा है, जो झारखंड के अनुसूचित जाति (SC) समुदाय के साथ एक मौन विश्वासघात की गवाही देता है।
बजट की चमक, सूने गलियारे और एक समाज
लगातार बजटीय घोषणाएं हो रही हैं, परंतु राज्य का अनुसूचित जाति आयोग आज भी नेतृत्व विहीन और निष्क्रिय पड़ा है। न तो किसी परामर्शदात्री समिति का अस्तित्व है और ना ही राज्य वित्त आयोग के गठन की कोई प्रशासनिक सुगबुगाहट दिखाई देती है। ये संस्थाएं कोई साधारण सरकारी भवन या कागज़ी कमेटियां नहीं हैं; ये इस दबे-कुचले वर्ग के अधिकारों, उनकी सुरक्षा और बजटीय हिस्सेदारी की निगरानी करने वाले संवैधानिक सुरक्षा कवच हैं। जब इन संस्थाओं के शीर्ष पर ताले लटके हों, तो करोड़ों के बजट का वह हिस्सा—जो इस समाज के अंतिम व्यक्ति के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए निर्धारित था—कहाँ, किस नीति से और किसकी मर्ज़ी से डाइवर्ट हो जाता है, इसका ऑडिट करने वाला कोई नहीं है।इस निरंतर अनदेखी को केवल प्रशासनिक शिथिलता मानना भारी भूल होगी; यह एक ऐसा सुनियोजित राजनीतिक अविश्वासघात है, जिसने इस पूरे वर्ग को संवैधानिक रूप से पंगु बना दिया है।
इस नीतिगत शून्यता के बीच, सबसे मार्मिक स्थिति इस समाज के शिक्षित युवाओं की है। जब व्यवस्था आपकी सुरक्षा और हक़ की बात करने वाले आयोगों को ही रिक्त रख कर तमाशा देखे, तो व्यक्तिगत स्तर पर अर्जियां लेकर भटकने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। वर्तमान तंत्र अब आवाज़ों को दबाने की पुरानी तकनीक का इस्तेमाल नहीं करता; वह आपकी आवाज़ को सुनने और उसे न्याय में बदलने वाली 'संवैधानिक संस्थाओं' को ही निष्क्रिय कर देता है। परिणाम यह है कि राज्य का योग्य और जागरूक युवा अपनी समस्याओं, प्रताड़ना और अधिकारों की मांग को लेकर अलग-अलग ज़िलों और गुटों में बिखरा हुआ है। हर ज़िले की चीख एक बंद कमरे में दम तोड़ देती है क्योंकि इस बिखराव को एक 'सामूहिक और संगठित ताकत' में बदलने का कोई माध्यम उपलब्ध नहीं है।
यहाँ आकर सवाल यह समाप्त हो जाता है कि सरकार ने इन आयोगों का गठन क्यों नहीं किया। असली और चुभता हुआ सवाल यह है कि इस सधे हुए धोखे के बाद भी यह समाज आज भी इस पारंपरिक व्यवस्था के रहम-ओ-करम पर क्यों बैठा है? जब तक युवा अपनी समस्याओं को लेकर अलग-अलग कोनों में अकेले संघर्ष करते रहेंगे, तब तक उनकी इस लाचारी का राजनीतिक सौदा होता रहेगा।
समय की मांग - 'केंद्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म'
क्या समय की यह मांग नहीं है कि इस भौगोलिक बिखराव और राजनीतिक उपेक्षा का उत्तर इसमें समाज के द्वारा एक 'केंद्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म' से दिया जाए? एक ऐसा अभेद्य और साझा डिजिटल महा-मंच—जो पूरे झारखंड के SC समुदाय की हर समस्या, हर प्रज्ञा और हर आवाज़ को एक ही डेटाबेस पर एकत्रित कर दे। एक ऐसा समानांतर कलेक्टिव (Parallel Collective), जहाँ राज्य के अंतिम छोर पर बैठा युवा भी सीधे जुड़कर अपनी समस्याओं को दर्ज कर सके, जहाँ किसी बिचौलिए की भूमिका या सरकारी मंज़ूरी की निर्भरता ही समाप्त हो जाए।
सोचिए, क्या इस समाज के भीतर एक ऐसी वैचारिक तड़प नहीं सुलगनी चाहिए जो इस बिखरी हुई आबादी को एक साझा 'डिजिटल शक्ति' में तब्दील कर दे? एक ऐसा स्वतंत्र मंच क्यों नहीं होना चाहिए जो बिखरी हुई चीखों को एक ऐसी संगठित गूँज बना दे, जिसे अनसुना करने की जोखिम सत्ता में बैठा कोई भी हुक्मरान न ले सके?
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