रांची: झारखंड की समकालीन राजनीति में नीतिगत प्राथमिकताओं और चुनावी रणनीतियों का द्वंद्व एक ऐसे मोड़ पर पहुँच चुका है, जहाँ दृश्य और अदृश्य के बीच का अंतर पूरी तरह समाप्त हो गया है। हालिया राज्यसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में घटित राजनीतिक घटनाक्रम केवल दो सीटों के विधायी समीकरणों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की सत्ता संरचना में निहित गहरे नीतिगत विरोधाभासों और 'प्रतीकात्मक तुष्टीकरण' (Tokenism) का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है। यह एक ऐसी विधा है, जहाँ प्रशासनिक उपेक्षा को सामाजिक न्याय के मुखौटे से ढंकने का प्रयास किया जा रहा है।
इस विरोधाभास का सबसे पहला और प्रामाणिक साक्ष्य राज्य के संस्थागत ढांचे में दिखाई देता है। लगातार दो बजटीय सत्रों का विधायी दायित्व पूर्ण हो जाने और अब तीसरे सत्र की ओर कदम बढ़ाने के बावजूद, अनुसूचित जाति (SC) आयोग, परामर्शदात्री समिति और राज्य वित्त आयोग जैसी शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं का गठन अधर में लटका हुआ है। ये संस्थाएं महज़ प्रशासनिक औपचारिकताएं नहीं हैं; ये इस वंचित वर्ग के अधिकारों, बजटीय आवंटन की शुचिता और सुरक्षात्मक निगरानी के लिए निर्मित संवैधानिक ढाल हैं। इन संस्थाओं के शीर्ष पदों को रिक्त रखकर पूरी तरह पंगु बना देना, इस समाज के प्रति एक गहरा और सुनियोजित नीतिगत विश्वासघात है। जब निगरानी का कोई केंद्रीय और वैध माध्यम ही अस्तित्व में न हो, तो बजटीय पन्नों पर इस वर्ग के उत्थान के लिए तय किए गए संसाधन कहाँ और किसकी प्रशासनिक इच्छाशक्ति से व्यय हो जाते हैं, इसका ऑडिट करने वाला कोई नहीं बचता।
इस संस्थागत शून्यता के समांतर, कार्यपालिका (मंत्रिमंडल) के स्तर पर सत्ता के विकेंद्रीकरण का एक अत्यंत जटिल और क्रूर विरोधाभास उभरता है। वर्तमान कैबिनेट में जहाँ गठबंधन के सहयोगी दल (कांग्रेस) ने अपने कोटे से एक स्थापित अनुसूचित जाति (SC) चेहरे—राधा कृष्ण किशोर—को वित्त, योजना एवं विकास और संसदीय कार्य जैसे राज्य के सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की चाबी सौंपकर इस वर्ग को वास्तविक नीतिगत और आर्थिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदार बनाया है, वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री की मुख्य पार्टी (JMM) के अपने कोटे से इस वर्ग का प्रतिनिधित्व आज भी पूर्णतः शून्य (0) है। प्रखंड से लेकर संगठन के शीर्ष स्तर तक, जिस दलित कैडर और कार्यकर्ता वर्ग ने अपनी प्रज्ञा और ऊर्जा से इस क्षेत्रीय दल की ज़मीन तैयार की, उन्हें आज नीतिगत निर्णयों से पूरी तरह किनारा लगा दिया गया है। यह बेदखली केवल पदों की नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के राजनीतिक भविष्य और नेतृत्व क्षमता को आंतरिक रूप से नियंत्रित करने का एक सधा हुआ प्रयास है।
SC के पीठ पर सत्ता गठबंधन के बड़े भाई का 'राजनीतिक स्टंट'
यही वह बिंदु है जहाँ से सत्ता दल के बड़े भाई की 'साजिश' एक 'राजनीतिक स्टंट' का रूप अख्तियार करती है। जब राज्य की वास्तविक सत्ता—जहाँ बजट स्वीकृत होते हैं, नीतियां बनती हैं और आयोगों के गठन के अधिकार सुरक्षित हैं—वहाँ अपने कोटे से इस वर्ग को पूर्णतः प्रतिनिधित्वहीन रखा गया हो, ठीक उसी समय राज्यसभा चुनाव में गठबंधन सहयोगी (कांग्रेस) के खिलाफ जाकर एक अनुसूचित जाति के उम्मीदवार का चयन करना, सत्ता के मनोविज्ञान की एक शातिर चाल है। यह चयन किसी वास्तविक सशक्तिकरण के उद्देश्य से नहीं, बल्कि कांग्रेस के 'वित्त मंत्री' वाले वास्तविक नीतिगत कदम की काट करने और एक 'कैच-22' की राजनीतिक बिसात बिछाने के लिए किया गया स्टंट प्रतीत होता है। इस मोहरे के ज़रिए एक तरफ जहाँ सहयोगी दल को संख्या बल के आगे लाचार बनाकर झुका दिया गया, वहीं दूसरी तरफ समाज के भीतर एक भ्रामक गौरव और प्रतीकात्मक संतोष पैदा करने का प्रयास किया गया है। सत्य यह है कि एक चेहरे को दिल्ली (राज्यसभा) भेजकर, राज्य के भीतर करोड़ों लोगों के वास्तविक अधिकारों और सुरक्षात्मक संस्थाओं पर लगे JMM कोटे के तालों को छिपाने का प्रयास किया जा रहा है।
यहाँ आकर समस्त पारंपरिक राजनीतिक विमर्श समाप्त हो जाता है। असली और चुभता हुआ सवाल यह नहीं है कि सत्ताधारी दल किस रणनीतिक चालाकी से अपने मोहरे चल रहे हैं। असली सवाल यह है कि इस बहुआयामी बेदखली और सधे हुए विश्वासघात के बाद भी यह समाज आज भी इस पारंपरिक व्यवस्था की चौखट पर याचक बनकर क्यों खड़ा है? जब पीड़ा का इतिहास एक है, जब संसाधनों से वंचित करने वाला तंत्र एक है, तो इस वर्ग की संगठित चेतना अलग-अलग टुकड़ों में क्यों बिखरी हुई है? जब तक युवा प्रखंड से लेकर राजधानी तक की व्यक्तिगत अर्ज़ियों को लेकर अलग-अलग कोनों में भटकते रहेंगे, तब तक उनकी इस लाचारी का इस्तेमाल केवल ऐसे ही राजनीतिक स्टंट्स के लिए होता रहेगा।
क्या समय की यह मांग नहीं है कि इस भौगोलिक बिखराव और प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व के खेल का उत्तर एक 'केंद्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म' से दिया जाए?
एक ऐसा अभेद्य और स्वतंत्र डिजिटल महा-मंच—जो पूरे झारखंड के SC समुदाय की हर समस्या, हर ज़मीनी हकीकत और हर आवाज़ को एक साझा डेटाबेस पर एकीकृत कर दे। एक ऐसा समानांतर कलेक्टिव (Parallel Collective), जहाँ राज्य के अंतिम छोर पर खड़े कार्यकर्ता और युवा को किसी राजनीतिक बिचौलिए या सरकारी मंज़ूरी की मोहताज़गी न हो। क्या समाज के भीतर एक ऐसी वैचारिक तड़प नहीं सुलगनी चाहिए जो इस बिखरी हुई आबादी को एक डिजिटल शक्ति में तब्दील कर दे? एक ऐसा साझा मंच क्यों नहीं होना चाहिए जो बिखरी हुई चीखों को एक ऐसी संगठित गूँज बना दे, जिसे अनसुना करने का जोखिम सत्ता में बैठा कोई भी हुक्मरान न उठा सके?
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