झारखंड: "जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी" केवल एक नारा नहीं,बल्कि झारखंड के SC समाज के लिए अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने का बीजमंत्र होना चाहिए।
रांची: झारखंड की राजनीति में अनुसूचित जाति (SC) समाज की वर्तमान स्थिति एक ऐसी 'त्रासद विडंबना' है, जहाँ लोकतंत्र के आंकड़ों में तो उनकी गिनती होती है, लेकिन नीति-निर्माण के मुख्य विमर्श में वे अक्सर अनुपस्थित पाए जाते हैं। राजनीतिक दल चुनावों के समय उनकी वोटों के लिए सक्रिय होते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनकी वास्तविक समस्याओं और आकांक्षाओं की अनदेखी की जाती है। यह स्थिति समाज के विकास और सशक्तिकरण में बाधा उत्पन्न करती है।
हाशिए पर धकेला गया 'समान नागरिक'
झारखंड की स्थापना का मूल आधार आदिवासी अस्मिता और जल-जंगल-जमीन का संघर्ष रहा है। इस 'आदिवासी-बनाम-गैर-आदिवासी' के द्विध्रुवीय राजनीतिक विमर्श में राज्य की लगभग 12% अनुसूचित जाति आबादी कहीं खो सी गई है। राजनीतिक दलों ने SC समाज को केवल 'वोट बैंक' की श्रेणी में सीमित कर दिया है, जहाँ चुनाव के समय वादे तो होते हैं, लेकिन सत्ता के गलियारों में उनकी हिस्सेदारी प्रतीकात्मक (Tokenism) बनकर रह जाती है।
सत्ता पक्ष और विपक्ष की दोहरी उदासीनता
झारखंड में चाहे सत्ता पक्ष (क्षेत्रीयता और आदिवासी हितों का पैरोकार) हो या विपक्ष (राष्ट्रीयता और बड़े जनाधार का दावा करने वाला), दोनों ने SC समाज के साथ 'चुनिंदा संवेदनशीलता' का रुख अपनाया है।
- सत्ता पक्ष का दृष्टिकोण: अक्सर क्षेत्रीय भावनाओं और जनजातीय अधिकारों को प्राथमिकता देते समय SC समाज की समस्याओं (जैसे भूमिहीनता और सामाजिक उत्पीड़न) को गौण मान लिया जाता है। SC समाज को 'बाहरी' और 'भीतरी' के संकीर्ण चश्मे से देखने की कोशिशें उनकी राजनीतिक जड़ें कमजोर करती हैं।
- विपक्ष का दृष्टिकोण: राष्ट्रीय दल अक्सर SC समाज को एक बड़े हिंदू सामाजिक ढांचे का हिस्सा मानकर उनके विशिष्ट जातिगत और आर्थिक मुद्दों को संबोधित करने के बजाय उन्हें केवल संगठित वोट बैंक के रूप में देखते हैं।
परिणामस्वरूप, झारखंड की नौ आरक्षित विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार अनुसूचित जाति समुदाय से होते हैं, तथापि, उनकी आवाज़ें उनकी अपनी पार्टी की नीतियों के अधीन दबकर रह जाती हैं। वे अपने समुदाय के 'प्रतिनिधि' होने के बजाय अपनी पार्टी के 'अनुगामी' अधिक प्रतीत होते हैं।
त्रासद राजनीतिक परिस्थितियों के मूल कारण
- नेतृत्व का अभाव: राज्य स्तर पर किसी ऐसे कद्दावर SC चेहरे का न उभरना, जो पूरे प्रदेश के अनुसूचित समाज को एकजुट कर सके।
- आर्थिक निर्भरता: समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी असंगठित मजदूरी और कृषि पर निर्भर है, जिससे उनकी राजनीतिक मोलभाव (Bargaining power) करने की शक्ति कम हो जाती है।
- मुद्दों का धुंधलीकरण: दलित उत्पीड़न, शिक्षा का अभाव और भूमि अधिकार जैसे बुनियादी मुद्दों को अक्सर 'पहचान की राजनीति' के शोर में दबा दिया जाता है।
भविष्य की दिशा: कहाँ है समाधान?
जब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही अनुसूचित जाति (SC) समाज के मुद्दों की उपेक्षा करते हैं, तो समाज को अपनी 'राजनीतिक स्वायत्तता' और 'सामाजिक चेतना' को सुदृढ़ करने पर ध्यान केंद्रित करना अनिवार्य हो जाता है। अनुसूचित जाति समुदाय के भविष्य की दिशा निम्नलिखित बिंदुओं पर आधारित होनी चाहिए:
- राजनीतिक चेतना और दबाव समूह का निर्माण: समाज को अब केवल पार्टियों का कार्यकर्ता बनने के बजाय 'प्रेशर ग्रुप' (दबाव समूह) के रूप में विकसित होना होगा। जब तक SC समाज अपनी एकजुटता का प्रदर्शन नहीं करेगा, राजनीतिक दल उन्हें गंभीरता से नहीं लेंगे।
- 'बहुजन समन्वय' की आवश्यकता: झारखंड में SC समाज को अपनी लड़ाई अकेले लड़ने के बजाय समान विचारधारा वाले समुदायों (पिछड़ों और प्रगतिशील आदिवासियों) के साथ रणनीतिक गठबंधन करना चाहिए, ताकि सत्ता के समीकरणों में उनकी भूमिका 'निर्णायक' बन सके।
- बौद्धिक और आर्थिक सशक्तिकरण: राजनीति केवल चुनावों से नहीं, बल्कि विचारों से भी जीती जाती है। समाज के शिक्षित युवाओं को नीतिगत विमर्श (Policy Discourse) में भाग लेना होगा। आरक्षण के लाभ के साथ-साथ उद्यमशीलता (Entrepreneurship) की ओर बढ़ना स्वावलंबन का मार्ग प्रशस्त करेगा।
- नेतृत्व का विकेंद्रीकरण: 9 आरक्षित सीटों के दायरे से बाहर निकलकर सामान्य सीटों पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराना और स्थानीय निकायों (Panchayats) में सशक्त नेतृत्व तैयार करना अनिवार्य है।
निष्कर्ष: झारखंड के SC समाज की त्रासदी यह नहीं है कि उनके पास शक्ति नहीं है, बल्कि यह है कि उनकी शक्ति का उपयोग दूसरे लोग अपने हितों के लिए कर रहे हैं। 'अनदेखी' का प्रतिकार 'याचना' से नहीं, बल्कि 'अधिकार' से होगा। आगामी समय में झारखंड की SC राजनीति को "प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व" से निकलकर "सार्थक भागीदारी" की ओर बढ़ना होगा। यदि समाज संगठित होकर अपनी स्वतंत्र पहचान और राजनीतिक एजेंडा तय नहीं करता, तो सत्ता और विपक्ष की यह जुगलबंदी उन्हें हाशिए पर ही रखेगी।
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