न्याय की प्रतीक्षा में 'हाशिये' का जीवन : अनुसूचित जाति (SC) की महिलाओं की स्थिति संविधान की प्रस्तावना में निहित 'गरिमा' और 'समता' के वादों के समक्ष एक ज्वलंत प्रश्नचिह्न है।
रांची: झारखंड के विस्तृत वनाच्छादित और खनिज संपन्न भू-भाग के बीच, अनुसूचित जाति (SC) की महिलाओं की स्थिति भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित 'गरिमा' और 'समता' के वादों के समक्ष एक ज्वलंत प्रश्नचिह्न है। यह स्थिति मात्र एक मानवीय त्रासदी नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक दंभ, जातिगत विद्वेष और प्रशासनिक 'संवेदनशून्यता' (Apathy) का एक ऐसा विषैला संगम है, जिसने संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) को इन महिलाओं के लिए अर्थहीन बना दिया है।
इस गंभीर परिदृश्य की एक समीक्षात्मक व्याख्या
- अंधविश्वास की आड़ में संपत्ति-हरण का षड्यंत्र : झारखंड में 'डायन-बिसाही' के नाम पर होने वाली हिंसा को केवल अंधविश्वास कहना, अपराध की गंभीरता को कम करने जैसा है। वैधानिक दृष्टि से यह एक 'लक्षित हिंसा' (Targeted Violence) है।
- विश्लेषण: अक्टूबर 2025 के NCRB के आंकड़े गवाह हैं कि यह कुप्रथा वास्तव में विधवा या एकल महिलाओं को उनकी भूमि और पैतृक संपत्ति से बेदखल करने की एक सुनियोजित 'सामंती साजिश' है।
- मर्म: 60 वर्षीय वृद्धा की नृशंस हत्या और सामूहिक दुष्कर्म केवल एक अपराध नहीं, बल्कि उस मानसिकता का परिचायक है जो दलित महिला के शरीर और उसकी जमीन, दोनों को 'उपभोग और लूट' की वस्तु समझती है।
आधुनिक दासता: मानव तस्करी और विस्थापन
झारखंड, मानव तस्करी के मानचित्र पर एक 'सोर्स स्टेट' के रूप में उभरना, राज्य के लिए एक कलंक है। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 (मानव दुर्व्यापार का निषेध) का खुला उल्लंघन है।
- आर्थिक विद्रूपता: भीषण गरीबी और खनन-जनित विस्थापन (जैसे लातेहार में कोल ब्लास्टिंग की घटनाएं) ने SC महिलाओं को 'आर्थिक शरणार्थी' बना दिया है। अपनी ही जमीन से उजड़कर, वे महानगरों की 'प्लेसमेंट एजेंसियों' के जाल में फंसकर आधुनिक दासता (Modern Slavery) की शिकार हो रही हैं।
- विश्वासघात: रक्षक ही भक्षक बन रहे हैं—जब अपने ही रिश्तेदार दलाल बन जाएं, तो सामाजिक ताने-बाने का यह बिखराव सबसे बड़ी पीड़ा है।
अंतर्विरोध: कानून का शासन बनाम 'दण्डमुक्ति की संस्कृति'
SC महिलाएं 'दोहरे विभेद' (Intersectional Discrimination) की शिकार हैं—प्रथम महिला होने के नाते, और द्वितीय दलित होने के नाते।
- यौन हिंसा: दबंग जातियों द्वारा यौन हिंसा का प्रयोग कामुकता के लिए नहीं, बल्कि 'शक्ति प्रदर्शन' (Power Projection) और पूरे समुदाय को आतंकित करने के लिए एक राजनीतिक हथियार के रूप में किया जा रहा है।
- प्रशासनिक लकवा: दहेज प्रतिषेध अधिनियम और SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम जैसे कठोर कानून मौजूद हैं, फिर भी अपराध दर का शीर्ष पर होना यह सिद्ध करता है कि कानून की 'आत्मा' पुलिसिया फाइलों में दम तोड़ रही है। FIR दर्ज न करना या मामलों को रफा-दफा करना राज्य की 'संवैधानिक विफलता' है।
कल्याणकारी राज्य का भ्रम: योजनाओं की जमीनी हकीकत
एक 'कल्याणकारी राज्य' (Welfare State) की अवधारणा तब ध्वस्त हो जाती है, जब बुनियादी ढांचा ही भेदभावपूर्ण हो।
- शिक्षा का उपहास: राजधानी रांची में SC हॉस्टलों की जर्जर स्थिति और सुरक्षा का अभाव यह दर्शाता है कि राज्य इन बेटियों को शिक्षित तो करना चाहता है, सुरक्षित नहीं।
- वित्तीय अन्याय: 'मईया सम्मान योजना' जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं में अहर्ता (Eligibility) पूर्ण करने के बावजूद, केवल SC महिलाओं की राशि का रुकना, नौकरशाही के भीतर छिपे जातिगत पूर्वाग्रहों (Institutional Casteism) की ओर इशारा करता है।
संवैधानिक आह्वान: झारखंड में अनुसूचित जाति की महिलाओं की पीड़ा को केवल 'गरीबी' के चश्मे से देखना भूल होगी। यह एक 'संरचनात्मक हिंसा' (Structural Violence) है। जहाँ अपराधी अपराध करके भी कानून की पकड़ से दूर हैं, और पीड़िताएं न्याय की गुहार में दम तोड़ रही हैं।
सावित्रीबाई फुले किशोरी समृद्धि योजना जैसी पहल उम्मीद की किरण जरूर हैं, लेकिन जब तक प्रशासन में 'नैतिक संवेदनशीलता' और समाज में 'जातिगत सुधार' नहीं होगा, तब तक ये योजनाएं केवल कागजी दस्तावेज बनकर रह जाएंगी। आवश्यकता है कि राज्य अपनी संवैधानिक कसम को याद करे और सुनिश्चित करे कि 'न्याय' केवल अदालतों में नहीं, बल्कि इन महिलाओं के द्वार तक पहुंचे।
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है।
सबसे पहले अपनी राय साझा करें!