झारखंड : SC समुदाय का शोषण और 'ग्लास सीलिंग' का एक अदृश्य क्रंदन। कागजी दावों से परे वास्तविक संवैधानिक न्याय और मानवीय गरिमा की एक मार्मिक पुकार।
झारखंड, जिसकी कोख में देश का 40% खनिज सुरक्षित है, वहां की विकास गाथा का एक अध्याय आज भी 'अदृश्य स्याही' से लिखा जा रहा है। यह अध्याय है—झारखंड के अनुसूचित जाति (SC) समुदाय का। राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 12% हिस्सा होने के बावजूद, यह समुदाय विकास के मानचित्र पर एक ऐसी 'छूट गई इकाई' की तरह है, जिसका क्रंदन जंगलों की सरसराहट और खदानों के शोर में दब गया है।
असंगठित क्षेत्र: 'आधुनिक दासता' और पलायन का दंश
झारखंड का SC समुदाय केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतर-राज्यीय पलायन का सबसे बड़ा शिकार है।
- श्रम का अवमूल्यन: ईंट-भट्ठों, निर्माण कार्यों और घरेलू कामों में लगे इस समुदाय के पास 'मोलभाव' की शक्ति शून्य है।
- पलायन की त्रासदी: रोजगार की तलाश में जब यहाँ का युवा महानगरों की ओर पलायन करता है, तो वह केवल घर नहीं छोड़ता, बल्कि अपनी सामाजिक सुरक्षा और पहचान भी खो देता है। वहां उसे न तो न्यूनतम मजदूरी मिलती है और न ही गरिमापूर्ण जीवन।
- भूमिहीनता: राज्य में आदिवासियों के लिए भूमि सुरक्षा कानून (CNT/SPT) हैं, लेकिन SC समुदाय का एक बड़ा हिस्सा आज भी 'भूमिहीन कृषि मजदूर' है। भूमि पर स्वामित्व का अभाव उन्हें आर्थिक रूप से हमेशा परजीवी बनाए रखता है।
संगठित क्षेत्र: प्रतिनिधित्व और 'मेरिट' का मिथक
जो मुट्ठी भर लोग व्यवस्था की बाधाओं को पार कर सरकारी सेवाओं में पहुंचे हैं, वहां संघर्ष का स्वरूप बदल जाता है।
- अदृश्य दीवारें (The Glass Ceiling): उच्च प्रशासनिक पदों पर SC समुदाय का प्रतिनिधित्व आज भी प्रतीकात्मक है। पदोन्नति के समय 'उपलब्धता' और 'योग्यता' के नाम पर जो सूक्ष्म भेदभाव होता है, वह गहरे मानसिक अवसाद को जन्म देता है।
- संविदा का जाल: वर्तमान में सरकारें नियमित भर्तियों के बजाय 'आउटसोर्सिंग' और 'संविदा' पर जोर दे रही हैं। इन क्षेत्रों में आरक्षण के प्रावधान शिथिल होने के कारण SC युवाओं के लिए दरवाजे बंद होते जा रहे हैं।
शिक्षा और डिजिटल विभाजन: बढ़ती सामाजिक दूरी
बाबासाहेब ने कहा था— "शिक्षित बनो", पर आज की शिक्षा 'बाजार' बन चुकी है।
- डिजिटल खाई: झारखंड के सुदूर गांवों में बिजली और इंटरनेट की कमी ने SC छात्रों को 'डिजिटल युग' से बाहर कर दिया है। जहाँ शहरों में बच्चे AI और कोडिंग सीख रहे हैं, वहीं राज्य के दलित टोलों के बच्चे एक अदद शिक्षक और ब्लैकबोर्ड के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
- ड्राप-आउट की दर: आर्थिक तंगी के कारण माध्यमिक शिक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ने की दर इस समुदाय में सर्वाधिक है, जो अंततः उन्हें फिर से अकुशल श्रम की ओर धकेल देती है।
समीक्षा और राज्य के लिए 'अक्षम्य' प्रश्न
झारखंड का विकास तब तक 'समावेशी' नहीं कहलाएगा, जब तक कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति 'अदृश्य' बना रहेगा। सरकार को निम्नलिखित बिंदुओं पर 'युद्धस्तर' पर काम करने की आवश्यकता है:
- भूमि सुधार और अधिकार: भूमिहीन SC परिवारों को पट्टा आवंटित करना और उन्हें कृषि उपकरणों तक पहुंच प्रदान करना अनिवार्य है।
- विशेष बैकलॉग अभियान: सरकारी विभागों में वर्षों से खाली पड़े आरक्षित पदों को भरने के लिए समयबद्ध अभियान चलाया जाए।
- पलायन सुरक्षा तंत्र: अंतर-राज्यीय पलायन करने वाले श्रमिकों के लिए 'ट्रैकिंग और सुरक्षा पोर्टल' को प्रभावी बनाया जाए ताकि उन्हें दूसरे राज्यों में दासता से बचाया जा सके।
- सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit): दलित कल्याण के लिए आवंटित बजट का खर्च कहाँ और कैसे हो रहा है, इसका निष्पक्ष सामाजिक ऑडिट होना चाहिए।
एक राजधर्म की पुकार : झारखंड की धरती के नीचे सोना और कोयला है, पर धरती के ऊपर रहने वाले इसके 'शिल्पकार' (SC समुदाय) आज भी अंधेरे में हैं। यह क्रंदन केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि संवैधानिक न्याय की मांग करता है। राज्य को यह समझना होगा कि संविधान का अनुच्छेद 46 कोई सुझाव नहीं, बल्कि राज्य के लिए एक 'आदेश' है। यदि आज भी इस समुदाय के आँसू नहीं पोंछे गए, तो इतिहास राज्य को ऐसी सभ्यता के रूप में याद रखेगा जिसने चमकते पत्थरों (खनिजों) की तो चिंता की, लेकिन उन जीवित मनुष्यों को भुला दिया जिनके पसीने से यह राज्य सींचा गया है।
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