झारखंड : SC समाज के लिए यह दो दशक 'अभाव से आस' और पुनः 'घोर हताशा' के बीच झूलती रही है। जहाँ सत्ता बदली, भूगोल बदला, पर SC समाज का भाग्य नहीं बदला।


रांची : झारखंड राज्य का उदय (2000) हाशिए पर खड़े समाजों के लिए मुक्ति का एक नया सूर्योदय माना गया था। किंतु, अनुसूचित जाति (SC) समाज के लिए यह दो दशक की यात्रा 'अभाव से आस' और पुनः 'घोर हताशा' के बीच झूलती रही है। यह केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि उस विडंबना की गाथा है जहाँ सत्ता बदली, भूगोल बदला, पर दलितों का भाग्य नहीं बदला

SC का स्वप्न और यथार्थ


1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: सामंतवाद से लोकतंत्र तक की पीड़ा : बिहार के दौर में यह समाज 'सामंती शोषण' और 'सूदखोरी' की चक्की में पिस रहा था। वे भूमिहीन थे, बेआवाज थे और विपन्नता ही उनकी नियति थी। राज्य गठन के बाद उम्मीद जागी कि अब विकास का केंद्र विस्थापित होकर 'अंतिम जन' तक पहुंचेगा। सरकारी योजनाएं बनीं, आरक्षण के प्रावधान आए, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव ने इन अधिकारों को धरातल पर उतरने से पहले ही दम तोड़ने पर मजबूर कर दिया।

2. सामाजिक और आर्थिक वंचना का चक्रव्यूह : झारखंड का दलित समाज आज भी एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसा है जहाँ आर्थिक तंगी और सामाजिक तिरस्कार एक-दूसरे को खाद-पानी देते हैं:

* भूमिहीनता का अभिशाप: यहाँ का SC समाज मुख्यतः कृषि पर निर्भर है, लेकिन विडंबना यह है कि 'हल उसी का है, पर खेत उसका नहीं'। भूमि का अभाव उन्हें केवल आर्थिक रूप से पंगु नहीं बनाता, बल्कि उन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा से भी वंचित रखता है।

* अदृश्य अस्पृश्यता: यद्यपि कानून ने छुआछूत मिटा दी है, लेकिन ग्रामीण झारखंड के मानसिक ढांचे में जातिगत श्रेष्ठता का दंश अब भी जीवित है। सम्मान के लिए उनका संघर्ष रोटी के संघर्ष जितना ही कठिन है।

* गरीबी की मार: 50,000 रुपये से कम की वार्षिक आय (NFHS डेटा) यह बताने के लिए पर्याप्त है कि राज्य की चमक-दमक के पीछे एक बड़ा वर्ग आज भी अंधेरे में जीवन बसर कर रहा है।

3. शिक्षा: एक अधूरी उड़ान : शिक्षा, जो इस अंधेरे को चीरने वाली एकमात्र किरण हो सकती थी, वह भी इस समाज की पहुंच से दूर है। गरीबी ने बच्चों के हाथों से किताबें छीनकर औजार थमा दिए हैं। साक्षरता दर में कमी, विशेषकर मातृशक्ति (महिलाओं) में, यह दर्शाती है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी संघर्ष कम नहीं होगा। स्कूलों की कमी और भेदभावपूर्ण वातावरण ने 'ड्रॉपआउट' को एक मजबूरी बना दिया है।

4. राजनीतिक मौन और नेतृत्व का संकट : सबसे गंभीर समीक्षात्मक पहलू यह है कि झारखंड की राजनीति में SC समाज 'मतदाता' तो है, पर 'शासक' नहीं।

* संवैधानिक शून्यता: अनुसूचित जाति आयोग जैसे संस्थान 'दंतहीन शेर' साबित हुए हैं। वे गठित तो होते हैं, पर न्याय दिलाने में अक्षम रहते हैं।

* नेतृत्व का अभाव: समाज में संगठित स्वर का अभाव है। राजनीतिक दल उन्हें केवल 'वोट बैंक' की तरह इस्तेमाल करते हैं, जिससे उनके मुद्दे घोषणापत्रों में तो आते हैं, पर नीतिगत निर्णयों में गायब हो जाते हैं।

आगे की विमर्श : झारखंड में अनुसूचित जाति की वर्तमान स्थिति इस बात का प्रमाण है कि 'व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण' के बिना 'राज्य में परिवर्तन' अपूर्ण है। यह संघर्ष अब केवल मूलभूत आवश्यकताओं तक सीमित न होकर 'गरिमा, भागीदारी और न्याय' की प्राप्ति पर केंद्रित है। जब तक भूमि सुधारों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जाता, शिक्षा तक सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित नहीं की जाती और राजनीतिक प्रक्रियाओं में उनकी सशक्त आवाज़ को स्थान नहीं मिलता, तब तक झारखंड के नवनिर्माण का स्वप्न अधूरा ही रहेगा।