झारखंड में SC समुदाय का आर्थिक संकट बहुआयामी और संरचनात्मक है, जो मुख्य रूप से अस्थिर आजीविका, अपर्याप्त संपत्ति आधार और शैक्षणिक पिछड़ेपन के कारण उत्पन्न होता है।
रांची : झारखंड में SC समुदाय का आर्थिक संकट महज़ गरीबी नहीं, बल्कि पीढ़ियों से संचित अभाव है। भूमिहीनता ने उनकी जड़ों को अस्थिर कर दिया है, तो शैक्षणिक पिछड़ेपन ने उनके पंख काट दिए हैं। संसाधनों से बेदखली और अकुशल श्रम की मजबूरी ने उन्हें एक ऐसे अदृश्य पिंजरे में कैद कर दिया है, जहाँ संघर्ष ही एकमात्र विरासत बन गई है।" झारखंड के SC समाज की आर्थिक भेद्यता के प्रमुख बिंदु:
आजीविका की अत्यधिक अस्थिरता (The Core Crisis)
- दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भरता: SC समुदाय की आर्थिक भेद्यता का मूल कारण दिहाड़ी मजदूरी पर उनकी अत्यधिक निर्भरता है। सीमांत भूमिधारक SC परिवारों की कुल आय का चौंका देने वाला 85 प्रतिशत हिस्सा अस्थिर और अनौपचारिक दिहाड़ी मजदूरी से आता है।
- शून्य पूंजी निर्माण: यह निर्भरता पूंजी निर्माण की संभावना को लगभग समाप्त कर देती है। यह दिहाड़ी मजदूरी एक 'अनुकूलन रणनीति' (Adaptive Strategy) है जो उन्हें केवल निर्वाह आय तक सीमित रखती है और किसी भी आर्थिक झटके (जैसे बीमारी या मौसमी उतार-चढ़ाव) को सहने की क्षमता को खत्म कर देती है।
- पोषण असुरक्षा: आय की इस अस्थिरता का सीधा परिणाम पोषण संकट है। ग्रामीण SC परिवारों का लगभग 15.28 प्रतिशत हिस्सा वर्ष के चार महीने या उससे अधिक समय तक खाद्यान्न की अपर्याप्तता (खाद्य असुरक्षा) का सामना करता है।
संपत्ति का अभाव और ऋण जाल
- सीमांत भूमि स्वामित्व: SC परिवारों का एक बड़ा हिस्सा, लगभग 79.28 प्रतिशत, सीमांत भूमिधारक है। इन भूखंडों का औसत आकार (0.40 हेक्टेयर) उत्पादक आय उत्पन्न करने के लिए बहुत कम है।
- वित्तीय बहिष्करण: इस सीमांत भूमि स्वामित्व के कारण ये परिवार औपचारिक वित्तीय संस्थानों से ऋण के लिए आवश्यक जमानत (Collateral) प्रदान नहीं कर पाते हैं। नतीजतन, वे उच्च-ब्याज वाले अनौपचारिक ऋणदाताओं के पास जाने के लिए मजबूर होते हैं, जो उन्हें ऋण जाल में फंसा देता है, जिससे संपत्ति और अधिक असुरक्षित हो जाती है।
मानव पूंजी और शैक्षणिक घाटा
- साक्षरता में पिछड़ापन: शैक्षणिक मोर्चे पर, 2011 की जनगणना के अनुसार, SC समुदाय की साक्षरता दर (55.80 प्रतिशत) अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय से कम रही है।
- उच्च शिक्षा तक सीमित पहुंच: राज्य में उच्च शिक्षा के लिए सकल नामांकन अनुपात (GER) केवल 20 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। यह शैक्षणिक घाटा SC युवाओं को उच्च-कौशल और स्थिर रोज़गार बाजार से बाहर रखता है, जिससे वे पीढ़ी दर पीढ़ी निम्न-कौशल वाली दिहाड़ी मजदूरी में फंसे रहते हैं।
नीतिगत कार्यान्वयन में चुनौतियां
नीतिगत असममिति: झारखंड में कल्याणकारी नीतियों में ऐतिहासिक रूप से ST समुदाय की सुरक्षा और विकास पर उच्च संस्थागत ध्यान रहा है (जैसे एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय - EMRS)। इस नीतिगत असममिति के कारण, अनुसूचित जाति उप-योजना (SCSP) जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के लिए समर्पित संसाधनों और लक्षित निगरानी की कमी देखी जाती है।
संरचनात्मक संकट को दूर करने के लिए, तीन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता
- आजीविका स्थिरीकरण: राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रमों (NSAP) का कवरेज और लाभ बढ़ाना और दिहाड़ी मजदूरों के लिए सूक्ष्म-उद्यमों (Micro-enterprises) को वित्तपोषित करने के लिए मुख्यमंत्री रोज़गार सृजन योजना जैसी पहलों में SC समुदाय के लिए विशेष उप-लक्ष्य (Sub-targets) निर्धारित करना।
- मानव पूंजी में निवेश: ST समुदाय के EMRS मॉडल के अनुरूप, SC छात्रों के लिए उच्च-गुणवत्ता वाले समर्पित आवासीय विद्यालयों का निर्माण करना।
- वित्तीय समावेशन: संस्थागत ऋण (Institutional Credit) तक सीमांत भूमिधारकों की पहुंच आसान बनाने के लिए नियमों में छूट देना, ताकि वे अनौपचारिक ऋणदाताओं के जाल से बच सकें।
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