झारखण्ड का सपना तभी साकार होगा जब 'अंतिम पायदान' पर खड़ा व्यक्ति भी महसूस करेगा कि यह राज्य उसका है। लोकतांत्रिक संवाद का अर्थ केवल पाँच साल में एक बार वोट देना नहीं है, बल्कि नीति-निर्माण की मेज पर अपनी जगह पाना है।
झारखण्ड के निर्माण की नींव में 'अस्मिता' और 'अधिकार' के स्वर मुखर थे। लेकिन दो दशकों के बाद, राज्य की सामाजिक-राजनीतिक बुनावट में एक ऐसा प्रश्न उभर रहा है जो अक्सर सत्ता के गलियारों में अनुत्तरित रह जाता है: क्या राज्य की 12.08% अनुसूचित जाति (SC) आबादी मुख्यधारा के लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है, या वह केवल चुनावी अंकगणित का एक 'मूक दर्शक' मात्र है?
सांख्यिकीय भारीपन और राजनीतिक शून्यता
झारखण्ड की जनसांख्यिकी को देखें तो पलामू (27.65%), चतरा (32.65%) और गढ़वा (24.19%) जैसे जिलों में अनुसूचित जाति समाज का घनत्व राज्य की राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। बावजूद इसके, राज्य का विमर्श अक्सर 'आदिवासी बनाम बाहरी' (Diku) के द्वंद्व में सिमटा रहता है।
- प्रतिनिधित्व का संकट: विधानसभा की 81 सीटों में से 9 सीटें SC के लिए आरक्षित हैं। विडंबना यह है कि ये प्रतिनिधि अपने समुदाय की विशिष्ट समस्याओं (जैसे भूमि अधिकार और सामाजिक भेदभाव) के बजाय पार्टी के 'हाई-कमांड' की प्राथमिकताओं तक सीमित हो जाते हैं।
- परिसीमन का गतिरोध: 2001 की जनगणना के आधार पर परिसीमन न होने से आबादी बढ़ने के बावजूद राजनीतिक भागीदारी स्थिर हो गई है, जो लोकतांत्रिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
संस्थागत मौन: जहाँ न्याय की उम्मीद टूटती है
लोकतंत्र संस्थाओं से चलता है, लेकिन झारखण्ड में अनुसूचित जाति समाज के लिए ये संस्थाएं 'संवेदनहीनता' का शिकार हैं।
- निष्क्रिय आयोग: 2019 से राज्य अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्षविहीन होना केवल प्रशासनिक शिथिलता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश है कि इस समाज की शिकायतें सुनने की प्राथमिकता सरकार की सूची में नहीं है।
- दस्तावेजी बहिष्कार: 'जाति प्रमाण पत्र' का न बन पाना केवल एक प्रक्रियात्मक देरी नहीं है। यह उस 'प्रवेश द्वार' का बंद होना है जो युवाओं को शिक्षा, छात्रवृत्ति और सरकारी नौकरियों तक पहुँचाता है। जब अंचल कार्यालयों (CO Office) में एक छात्र का फॉर्म अटकता है, तो असल में एक पीढ़ी का भविष्य अटकता है।
सामाजिक-आर्थिक धरातल: चुनौतियों का संजाल
आर्थिक आंकड़ों के पीछे छिपा दर्द अधिक गहरा है। झारखण्ड में कृषि का महिलाकरण (Feminization of Agriculture) और पुरुषों का अनौपचारिक श्रम की ओर पलायन, एससी समाज की आर्थिक असुरक्षा को दर्शाता है।
पहचान का विलोपन: 'मुलवासी' विमर्श में SC कहाँ?
झारखण्ड के बौद्धिक और अकादमिक विमर्श में अक्सर 'आदिवासी' और 'मुलवासी' की परिभाषाओं को इस तरह बुना जाता है कि अनुसूचित जाति समाज उसमें 'अजनबी' महसूस करने लगता है।
- वे न तो पूर्णतः 'आदिवासी' विमर्श के अधिकारों (जैसे 5वीं अनुसूची) का हिस्सा बन पाते हैं।
- न ही उन्हें वह सामाजिक सम्मान मिल पाता है जिसके वे इस मिट्टी के पुराने निवासी होने के नाते हकदार हैं।
यह 'पहचान का संकट' (Identity Crisis) उन्हें सामाजिक अलगाव की ओर धकेल रहा है।
समाधान की राह: संवाद से सशक्तिकरण तक
इस लोकतांत्रिक संकट को सुलझाने के लिए 'प्रतीकात्मक राजनीति' से ऊपर उठकर ठोस कदम उठाने होंगे:
- संस्थानों को जीवित करना: SC आयोग का तत्काल गठन और उसे अर्ध-न्यायिक शक्तियां प्रदान करना।
- प्रशासनिक जवाबदेही: जाति प्रमाण पत्र और कल्याणकारी योजनाओं में देरी करने वाले अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई।
- आरक्षण रोस्टर की समीक्षा: स्थानीय निकायों (जैसे नगर निगम) में जनसंख्या के वास्तविक अनुपात में सीटों का आवंटन।
- शिक्षा का लोकतंत्रीकरण: एससी-बहुल क्षेत्रों में विशेष आवासीय विद्यालयों और कौशल केंद्रों की स्थापना।
निष्कर्ष: झारखण्ड का सपना तभी साकार होगा जब 'अंतिम पायदान' पर खड़ा व्यक्ति भी महसूस करेगा कि यह राज्य उसका है। लोकतांत्रिक संवाद का अर्थ केवल पाँच साल में एक बार वोट देना नहीं है, बल्कि नीति-निर्माण की मेज पर अपनी जगह पाना है। यदि आज हम इस संवाद संकट को दूर नहीं करते, तो यह सामाजिक असंतोष भविष्य में एक गहरी खाई का रूप ले सकता है। वक्त है कि झारखण्ड की आवाज़ में 'दलित' स्वर को भी उतनी ही गूंज मिले, जितनी अन्य समुदायों को मिलती है।
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