​​झारखंड के SC समाज का युवा आज उस मुकाम पर है जहाँ उसे तय करना है कि वह सत्ता की थाली सजाने वाला 'सेवक' बनेगा या सत्ता में बराबर का 'साझेदार'।

रांची: झारखंड में अनुसूचित जाति (SC) समुदाय, जो राज्य की आबादी का लगभग 12.08% है, वर्तमान में एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। 9 आरक्षित विधानसभा सीटों के साथ यह समुदाय सत्ता का 'किंगमेकर' बनने की क्षमता रखता है, लेकिन विडंबना यह है कि यह अभी भी एक सशक्त 'दबाव समूह' के रूप में उभरने के लिए संघर्ष कर रहा है।

उपेक्षित 'वोट बैंक'

1. संरचनात्मक बाधाएं: क्यों नहीं बन पा रहा स्वतंत्र नेतृत्व?

​राजनीति केवल चुनाव लड़ने का नाम नहीं है, यह वर्चस्व और व्यवस्था की लड़ाई है। यहाँ SC युवाओं के सामने तीन प्रमुख चुनौतियाँ हैं:

  • पॉलिटिकल गेटकीपिंग (राजनीतिक पहरेदारी): स्थापित दलों के शीर्ष पर बैठे 'सिंडिकेट' या प्रभावशाली परिवार यह तय करते हैं कि कौन आगे बढ़ेगा। स्वतंत्र सोच वाले शिक्षित युवाओं के बजाय 'आज्ञाकारी कार्यकर्ताओं' को प्राथमिकता दी जाती है।
  • सोशल कैपिटल (सामाजिक पूंजी) का अभाव: निर्णय लेने वाली जगहों (नौकरशाही, मीडिया, बड़े व्यापार) में प्रतिनिधित्व कम होने के कारण, SC युवाओं को वह 'सिस्टम सपोर्ट' नहीं मिलता जो अन्य वर्गों को सहज उपलब्ध है।
  • कांच की छत (Glass Ceiling): SC नेताओं को अक्सर 'मुख्य संगठन' के बजाय 'अनुसूचित जाति मोर्चा' जैसी शाखाओं तक सीमित कर दिया जाता है, जो उनके विकास को एक घेरे में बांध देता है।

मुख्य राजनीतिक दलों का दृष्टिकोण और चुनौतियाँ

​1. भारतीय जनता पार्टी (BJP): विकास और हिंदुत्व का समन्वय

  1. मजबूत पकड़: परंपरागत रूप से, झारखंड में SC समुदाय का एक बड़ा हिस्सा भाजपा का समर्थक रहा है। 2014 और 2019 के चुनावों में भाजपा ने सुरक्षित सीटों पर अच्छा प्रदर्शन किया था।
  2. रणनीति: भाजपा 'लाभार्थी राजनीति' (उज्ज्वला, राशन, आवास) और 'हिंदुत्व' के समावेशी ढांचे के जरिए इस समुदाय को जोड़ने का प्रयास करती है। समुदाय को लगता है कि बड़े फैसलों और सत्ता की भागीदारी में उन्हें उचित स्थान नहीं मिला।
  3. चुनौती: स्थानीय स्तर पर 'आदिवासी बनाम गैर-आदिवासी' की राजनीति में कभी-कभी SC समुदाय खुद को उपेक्षित महसूस करता है।

​2. झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM): 'मूलवासी' कार्ड और क्षेत्रीय पहचान

  • बदलता रुख: पहले JMM को केवल आदिवासियों (ST) की पार्टी माना जाता था। लेकिन हेमंत सोरेन ने '1932 का खतियान' और 'स्थानीयता' के मुद्दे उठाकर SC समुदाय को 'मूलवासी' के रूप में खुद से जोड़ने की सफल कोशिश की है।
  • रणनीति: JMM अब SC समुदाय को यह एहसास दिलाने की कोशिश कर रहा है कि उनके हित बाहरी लोगों (दिक्कू) के बजाय यहाँ के क्षेत्रीय दलों के साथ सुरक्षित हैं। लेकिन SC समुदाय के मुद्दों की अनदेखी उसकी मंशा का अलग चित्रण प्रस्तुत करती है।
  • चुनौती: सुरक्षित सीटों पर JMM का प्रदर्शन भाजपा की तुलना में अक्सर कमजोर रहा है, जिसे सुधारना उनके लिए बड़ी चुनौती है।

​3. कांग्रेस (INC): पुराना आधार और सामाजिक न्याय

  • स्थिति: कांग्रेस का SC समुदाय में एक पुराना और वफादार वोट बैंक रहा है, खासकर चमार और दुसाध जातियों के बीच।
  • रणनीति: 'जातिगत जनगणना' और 'संविधान बचाओ' जैसे नारों के जरिए कांग्रेस इस समुदाय के शिक्षित युवाओं और बुद्धिजीवियों को आकर्षित करना चाह रही है लेकिन उसके जमीनी संगठनीक बुनावट कुछ अलग कहानी कहती है।

​4. आजसू (AJSU) एवं अन्य क्षेत्रीय दल

​प्रभाव: सुदेश महतो की पार्टी AJSU कुछ खास पॉकेट्स में (जैसे सिल्ली और आस-पास के क्षेत्र) SC वोटों में सेंध लगाने में कामयाब रहती है। वे 'माटी की राजनीति' के जरिए छोटे-छोटे समूहों को जोड़ते हैं, लेकिन इससे इस समुदाय का राजनीतिक समस्या हल होता प्रतीत नहीं होता।

पहचान का संकट: 'क्षेत्रीय' बनाम 'जातीय'

​झारखंड की राजनीति में 'स्थानीयता' (खतियान) एक बड़ा मुद्दा है। यहाँ अक्सर एक कृत्रिम दुविधा पैदा की जाती है:

  • बाहरी होने का ठप्पा: राजनीतिक लाभ के लिए कई बार SC समाज को 'बाहरी' दिखाने की कोशिश की जाती है, जबकि वे सदियों से झारखंड की मिट्टी और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं।
  • परिणाम: इस 'रक्षात्मक' (Defensive) स्थिति के कारण युवा नेतृत्व आक्रामक होकर अपनी हिस्सेदारी नहीं मांग पाता।

राजनीतिक सशक्तिकरण का नया रोडमैप (Social Engineering 2.0)

​यदि SC समाज को केवल 'पूरक वोट बैंक' से हटकर 'स्वतंत्र शक्ति' बनना है, तो ये चार स्तंभ अनिवार्य हैं:

  1. बौद्धिक नेतृत्व (Intellectual Leadership): केवल नारों से काम नहीं चलेगा। युवाओं को बजट, नीति और कानून की गहरी समझ विकसित करनी होगी ताकि उन्हें नजरअंदाज करना नामुमकिन हो।
  2. अम्बेडकरवादी वोट ब्लॉक: उप-जातियों (चमार, दुसाध, मुसहर, पासी, धोबी आदि) के बिखराव को खत्म कर एक सामूहिक 'बार्गेनिंग पावर' बनानी होगी।
  3. आर्थिक आत्मनिर्भरता: राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए आर्थिक मजबूती जरूरी है, ताकि नेतृत्व किसी दल के 'आर्थिक रहमोकरम' पर निर्भर न रहे।
  4. स्वयं का मीडिया तंत्र: मुख्यधारा के मीडिया पर निर्भर रहने के बजाय सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए अपनी कहानियाँ और संघर्ष खुद बयां करने होंगे।

​निष्कर्ष : झारखंड के SC समाज का युवा आज उस मुकाम पर है जहाँ उसे तय करना है कि वह सत्ता की थाली सजाने वाला 'सेवक' बनेगा या सत्ता में बराबर का 'साझेदार'। सत्ता मांगी नहीं, अपनी योग्यता और एकता के बल पर जीती जाती है। जब तक राज्य के अंतिम व्यक्ति को शासन में अपनी वास्तविक हिस्सेदारी महसूस नहीं होगी, तब तक झारखंड के गठन का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा।