झारखंड एससी आयोग: यह संस्थागत रिक्तता हाशिए पर खड़े समाज के 'न्याय के अधिकार' का गला घोंटने जैसा है। रक्षक ही अनुपस्थित हो, तो लोकतंत्र की "सामाजिक न्याय" की अवधारणा केवल एक खोखला नारा है।
रांची: झारखंड की 12.08% अनुसूचित जाति जनसंख्या आज एक 'प्रशासनिक अनाथपन' का सामना कर रही है। 'झारखंड राज्य अनुसूचित जाति आयोग अधिनियम, 2018' के बावजूद, आयोग के पदों का रिक्त होना केवल एक नीतिगत विफलता नहीं, बल्कि दलित समुदाय के प्रति राज्य की संवैधानिक उदासीनता का परिचायक है।
- विधिक मृतप्राय स्थिति: आयोग का गठन न होने से 2018 का अधिनियम मात्र एक 'कागजी कवच' बनकर रह गया है। नेतृत्व के अभाव में सुरक्षा की वैधानिक कड़ियाँ टूट चुकी हैं।
- न्यायिक अपंगता: अनुच्छेद 338 के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र तो है, परंतु राज्य स्तर पर 'सिविल कोर्ट' की शक्तियों वाली संस्था के न होने से स्थानीय अत्याचारों के विरुद्ध त्वरित हस्तक्षेप और साक्ष्य संकलन की प्रक्रिया ठप है।
- अदृश्य सामाजिक क्षति: यह शून्यता केवल शिकायतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह छात्रवृत्ति, आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं की निगरानी के अभाव में दलित समाज को आर्थिक और शैक्षणिक रूप से दशकों पीछे धकेल रही है।
संस्थागत और कानूनी विफलता
'झारखंड राज्य अनुसूचित जाति आयोग अधिनियम, 2018' के बावजूद, नेतृत्व (अध्यक्ष/सदस्य) की अनुपस्थिति ने इस संवैधानिक सुरक्षा चक्र को कागजी बना दिया है।
- शक्तियों का ह्रास: धारा 10 के तहत मिलने वाली सिविल कोर्ट की शक्तियों के अभाव में प्रशासनिक अधिकारी जवाबदेही से बच रहे हैं।
- न्यायिक शून्यता: स्थानीय स्तर पर शिकायतों के निवारण का कोई प्रभावी मंच नहीं बचा है, जिससे समुदाय केवल पुलिस और धीमी न्यायपालिका पर निर्भर है।
प्रशासनिक प्रतिनिधित्व का संकट
डेटा दर्शाता है कि राज्य में SC समुदाय की 12.08% जनसंख्या के मुकाबले सरकारी पदोन्नति में उनकी हिस्सेदारी मात्र 4.45% है।
- आरक्षण का मुद्दा: आयोग की अनुपस्थिति में "अपर्याप्त प्रतिनिधित्व" का मात्रात्मक डेटा एकत्र नहीं हो पा रहा है, जिससे पदोन्नति में आरक्षण और बैकलॉग नियुक्तियां (जैसे APP भर्ती 2025) बाधित हो रही हैं।
भूमि विस्थापन और विधिक असुरक्षा
दलितों की भूमि पर अवैध कब्जे के मामले बढ़ रहे हैं।
- सुरक्षा का अभाव: जामताड़ा के चिरूडीह जैसे मामलों में आयोग के हस्तक्षेप के बिना पीड़ितों को न्याय मिलना असंभव हो गया है। आयोग के न होने से राजस्व अधिकारी और पुलिस अक्सर दबंगों के पक्ष में झुके नजर आते हैं।
आर्थिक और शैक्षिक प्रहार
- छात्रवृत्ति संकट: 'ई-कल्याण' पोर्टल की विफलता और फंड की देरी से लाखों SC छात्र प्रभावित हैं, जिससे 'ड्रॉप-आउट' दर बढ़ रही है।
- बजट डायवर्जन: अनुसूचित जाति उप-योजना (SCSP) के फंड का अन्य योजनाओं में उपयोग हो रहा है। CAG रिपोर्ट के अनुसार, 1.33 लाख करोड़ के 'उपयोग प्रमाण पत्र' लंबित हैं, जो वित्तीय कुप्रबंधन को दर्शाता है।
सामाजिक अत्याचार और कानून प्रवर्तन
झारखंड में SC/ST एक्ट के तहत दोषसिद्धि दर (Conviction Rate) गिरकर 32.4% रह गई है। आयोग के बिना पुलिस द्वारा मामलों को हल्का करने या जांच में देरी करने पर कोई अंकुश नहीं है।
निष्कर्ष और समाधान की राह
आयोग का गठन न होना केवल एक पद की रिक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के ढांचे का क्षरण है। इसके समाधान हेतु निम्न कदम अनिवार्य हैं। भविष्य की दिशा में निम्नलिखित कदम अनिवार्य हैं:
- तत्काल नियुक्तियां: आयोग में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों के पदों पर ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति की जाए जिनके पास सामाजिक न्याय के क्षेत्र में कार्य करने का लंबा अनुभव हो।
- बजट की सुरक्षा: एससी छात्रवृत्ति और एससीएसपी फंड की सुरक्षा के लिए एक 'लॉक-इन' तंत्र बनाया जाए, ताकि इन निधियों को अन्य योजनाओं में न मोड़ा जा सके।
- भूमि संरक्षण सेल: आयोग के भीतर एक विशेष 'भूमि विवाद समाधान सेल' बनाया जाए जो राजस्व अधिकारियों के साथ मिलकर दलितों की छीनी गई भूमि को वापस दिलाने का कार्य करे।
- वार्षिक ऑडिट: राज्य विधानसभा में प्रतिवर्ष एससी समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर एक "व्हाइट पेपर" या 'सोशल ऑडिट' रिपोर्ट पेश करना अनिवार्य किया जाए ।
मसलन, झारखंड का विकास तभी संभव है जब उसके सभी नागरिक, विशेष रूप से सबसे कमजोर वर्ग, सुरक्षित और समर्थ महसूस करें। अनुसूचित जाति आयोग की बहाली इस दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम होगा। सामाजिक न्याय केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक संवैधानिक गारंटी है जिसे झारखंड के दलित समाज को उपलब्ध कराना राज्य सरकार का प्राथमिक कर्तव्य है।
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